🌙 "माँ का इंतज़ार" –🌙
🌙 "माँ का इंतज़ार" – इमोशनल कविता 🌙 जब भी थक कर चुप बैठता हूँ, एक आवाज़ भीतर से आती है — "बेटा खाना खा लिया?" वो आवाज़ अब नहीं आती… पर दिल अब भी रोज़ वही सवाल दोहराता है। घर के कोने में वो चारपाई, जहाँ बैठी रहती थी माँ… अब भी वैसी ही है, बस अब वो इंतज़ार करती है — मेरे लौटने का। कभी रोटियाँ बेलते हुए, कभी सर पे हाथ फेरते हुए, माँ ने अपना सारा जीवन मेरी मुस्कान में बसा दिया… अब मैं हर मुस्कान में माँ को ढूंढता हूँ। वो सुबह की चाय, वो सर्दी की रज़ाई, वो दुआओं की थाली और आँचल की परछाई… सब कुछ तो छोड़ आया हूँ पीछे, बस माँ का इंतज़ार अभी तक साथ है।
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