मां
एखुदा अक्सर सुना है मैंने लोगों को जन्नत का जिक्र करते हुए ज़रा उन्हें मां के आंचल से रूबरू तो करवाना, भटकते फिरते है सुकून की तलाश में ज़रा उन्हें अपने इस स्वरूप का एहसास तो दिलाना।। यूं तो किसी जिक्र की मोहताज नही है वो बख्शी है खुदा ने मुझे जो सबसे खुशनुमा पलों को जीने के लिए ज़िंदगी की वो मोहलत है वो, इतनी मेरी औकात नहीं कि लफ्जों में बयां कर पाऊं मां का गुणगान, ये तो ऐसे हो जाएगा जैसे छोटे मुंह से बड़ी बात का बखानक। सूरत में जैसे कोई आसमानी परी है वो सीरत मैं भी खूबसूरती से भरी है वो अल्फाज़ उसके शहद में घुले हुए लगते ह ज्ञान में समंदर से भी गहरी है वो।। तुझे खोने से डर लगता है तेरे होने से ये घर, घर लगता है तू हमेशा मेरा साया बनकर चलना क्योंकि साथ तेरा जेसेअच्छे कर्मो के बदले में भगवान से मिला कोई वर लगता है।। चांद की चांदनी सा नूर है चेहरे में उसके सूरज की रोशनी जैसा तेज है आंखों में उसके, एक अलग ही सुकून दे जाती है उसकी एक झलक भी, खुशनसीब है हम सभी पास है ये कोहिनूर जिसके।।
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