हो कौन तुम?
कवित्व के छंद सी पंक्ति हो तुम, प्रेम के अगन सी विरह हो तुम, उम्मीदों के पुल पर टिकी स्तम्भ हो तुम, जीवन के संघर्षों की कलम हो तुम, ए- जिंदगी पर; हो कौन तुम ?
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