फैसला
सबको माफ करते जाओ सबको माफी देते जाओ शारीरिक कष्टों से मुक्त हो सबको मन की शांति देते जाओ। कितना आसान है कहना न उस बाप से पूछो जो सेवा कर थक गया हो सारा अर्जित एक आस फूंक गया हो मां का क्या है उसके तो आंसू भी सुख गए न। आसान नहीं रहा होगा ये फैसला जीवन की आस में तेरस साल तपना सेवा भी बोझिल बन गयी होगी फिर सेवा से मुक्ति के हेतु भी प्रयास करना। एक पिता के लिए संतति बेमोल है वही जीने का सहारा खुशहाली का स्रोत है पर बेटे को देख पीड़ा हो तो मुक्ति जरूरी है दिल पर पत्थर रख बेटे की मुक्ति जरूरी है। कष्ट से मुक्ति तो जरूरी ही हैं शारीरिक हो या मानसिक दोनों को सहना आसान नहीं है शरीर से मुक्ति ही पीड़ाओं से मुक्ति है। पर मेरे मन में द्वंद है सही गलत के बीच फंसा मन है कहीं ये चलन न चल जाए संसार में नहीं तो ये रास्ता तो सेवा भाव की मुक्ति है।
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