ज़ख़्म
●●● चोट के जख्म तो भर जाते हैं, बातों के जख्म घर कर जाते हैं। आँखों के अश्क़ तो देखे सबने, दिल के नासूर किधर जाते हैं।। ज़ंगी तलवारें तो तन काट गईं, वो कुछ ही दिन में टूट जाती हैं। शब्दों के तीर तो जीवन भर, बस कसक बैचेनी छोड़ जाते हैं।। कुछ लफ़्ज़ सीना ऐसे चीर गए, जैसे साँसों से रिश्ता तोड़ दिया। हँसते चेहरों के पीछे छुपकर के, लोग अपने दिल तोड़ जाते हैं।। कहनी हर बात जरूरी तो नहीं, कुछ बातें ज़हर ही बन जाती हैं। अपनापन होता है खामोशी में, ताने रिश्तों की क़बर बनाते हैं।। ख़ुद अपने ही घाव जब देंदें, जब नमक अपनों ने छिड़का हों। 'अयन' बचना कुछ कहने से, निकले लफ़्ज़ लौट नहीं पाते हैं।। ●●● ©deovrat 'अयन' 26.05.2025
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