प्रतिबन्धक उड़ान
बसा लिया उस आजाद पंछी ने अपना सुनहरा संसार। ढूंढ लिया वो सुकून जो हर बारी हाथ में आते आते फिसल सा जाता था। पर फिर भी क्यों एक अधूरेपन का अहसास होता रहता। क्यों अपने अथित के बड़ी बड़ी आंखों में छुपे छोटे छोटे सवाल का सामना करते ही वो वापस वही डरी सहमी सी चिड़िया बन जाती जिसे अपने हर फैसले पर यकीन नहीं शक हो। कौनसी बंदिश ऐसी हैं जिसने आज भी उसे अपने सपनो से दूर बांध रखा है
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