मातृत्व और माँ
●●● तपती लू की मार थी, गर्मी से था आकाश भरा, घोंसले में गोरैया लौटी, तन-मन से थी थकी ज़रा। बिना तनिक भी सुस्ताए, ना ही कोई वक़्त गंवाए, घोंसले में थे चूज़े उसके, थी वहीं पर प्रीत सजी। तिनका-तिनका जोड़ बना था, प्यार उसका घर, जहाँ चहकते चूज़ों को देख नहीं भरती कभी नज़र। उल्लासित नन्ही आँखें, अपनी चोंचों को फैलाये, माँ की ममता देखो, हर पीड़ा स्वयं झेल रही। दाने चुग कर लाई वह, मन में था संतोष भरा, हर चूज़े की चोंच में तब जीवन का रस उतरा। थकन हुई अतिरेक, रही ना अब चिंता कोई, ममता में उस मधुर क्षण, अमित शांति बस रही। चूज़ों की प्यारी बोली में था सुख का मधुर राग, हर स्पर्श था माँ का जैसे कोई वरदान अनूप भाग। आकाश भले तप जाए, पर छाँव थी उसके पंख, ममतामयी गोरैया हृदय में मातृत्व की सरिता बही। माँ बच्चों की चहक से गूंजा, फिर प्यारा घोंसला, प्रेम की उस पावन छाया में मिटा हर दर्द का धुआँ। नन्ही चिड़िया बन गई, ममता की प्रति मूरत, "अयन" मातृत्व की सच्ची सूरत तो होती है यही। ●●● ©deovrat अयन’ 10.05.2025
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