इश्क
यूँ टकरा गई नजर उनसे, कि दूर हो कर रह गई, संगमरमर सा बदन , आखें जा कर रुक गई, कभी ये ऐसा होता है, जब मैं शायर बन जाता हूँ, ऐसे हुस्न को देखकर पागल सा हो जाता हूँ, किस फुर्सत से बनाता है भगवान इन्हें, यह समझ नहीं पाता हूँ, ऐ तब्बसुम की सुंदरता का क्या होगा नाम, कभी जान नहीं पाता हूँ, जो भी हो तुम, नाम तुमहारा, इश्क सबको बतलाता हूँ,,
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