संघर्ष
मेरी मंजिल मेरा हौंसला देख कर... डर मुझे भी लगा फासला देख कर, पर मैं बढ़ता गया रास्ता देख कर, खुद ब खुद मेरे नजदीक आती गई, मेरी मंजिल मेरा हौंसला देख कर जब हौसला बना लिया ऊंची उड़ान का फिर देखना फिजूल है कद आसमान का अच्छा मुसाफ़िर बन जाऊँगा… चलता रहूँगा पथ पर, चलने में माहिर बन जाऊँगा, या तो मंजिल मिल जायेगी या अच्छा मुसाफ़िर बन जाऊँगा… पसीने की स्याही से जो लिखते हैं इरादें को, उसके मुक्कद्दर के सफ़ेद पन्ने कभी कोरे नही होते By PANKAJ KUMAR SHARMA
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