भीगती दुआएं और सूखे इरादे
(भीगती दुआएं और सूखे इरादे) भीगती दुआएं कितनी प्यारी सी लगती है जैसे नन्हीं सी कली जब खिल उठती है । दिलों में कुछ कसक छोड़ जाती है जब इरादों को सुखा - सुखा वो पाती है | कहते हैं दुआओं का असर बहुत होता है फ़िर क्यों ना जाने मन में एक भय सा बना रहता है | जब सभी की हो सार्थक दुआएं, गर दस्तक दे कुछ सूखे इरादे अजीब सा अनमनापन और रुआंसापन पाता है ये दिल जब आ जाती है ऐसी मुश्किल। यकायक कुछ परिवर्तन चेहरों पर प्रतीत होने लगता है | लगा बैठते है उम्मीदें अक्सर,अपने ही अपनों से न जाने क्यों उन इरादों का सूखापन उन्हें खलने सा लगता है | करते हैं मेहनत के दम पर जो नौकरियां उन्हीं को दफ़्तर और घर अब खटकने सा लगता है | जब सूखे इरादे मन को छलने लगे कुछ भी करने को मन कहां लगे पत्थर की मूर्त सा बन जाता है, इंसान तब जब हाल उसका कुछ ऐसा होने सा लगता है| फ़िर एक उम्मीद अचानक से उठती है एक चमत्कार के होने सी ज़रूर कुछ आंखों से टपकती अश्रुधाराएं होंगी | जिनमें समाहित होगी भीगती दुआएं उनके लिए एक दिन अवश्य वो मुकम्मल होंगी| सावन में बौछारों के साथ घुल जाएगी वो जब रोशन होगी दुआओं संग किसी की जिंदगी तो इरादों की जीत कितनी खुशियां दर्शाएगी| स्वाति की कलम से ✍️
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