‘आईना घोर से देखा है मुझको'
मुस्कुराता ये चेहरा खामोश दिखता है उसको, मेरे घर का आईना घोर से देखता है मुझको.... कच्ची उम्र से बिखरने लगा हूं मैं, अपना तजुर्बा तक भूल गया हूं मैं, गैरों से सीख रहा हूं,मुस्कुराने का सलीका, देख तेरे इश्क में कितना मजबूर हो गया हूं मैं, मुस्कुराता ये चेहरा खामोश दिखता है उसको, मेरे घर का आईना घोर से देखता है मुझको..... मैं फिक्रमंद हूं हर दफा बस तेरे लिए, मेरी पहली और आखिरी तवजू है तेरा इश्क, अब तक कितना बदल गया हूं अपने वादों से, तू सोच मेरे निजी मसले तक नाराज बैठे है मुझसे, मुस्कुराता ये चेहरा खामोश दिखता है उसको, मेरे घर का आईना गौर से देखता है मुझको..... हर शाम गहरी नज़्म सुनाती है मोहब्बत तेरी, कितने अतरंगी ख्वाब दिखाती है यादें तेरी, ओर इतना सब्र आता है आवारगी में तेरी, धीरे-धीरे तबाह हो गई भरी जवानी मेरी, मुस्कुराता ये चेहरा खामोश दिखता है उसको, मेरे घर का आईना घोर से देखता है मुझको, इजहारे इश्क का अफ़सोस न जता, बशर्ते मेरी आदत में बसती हैं चाहत तेरी, ये नाराज़गी इतनी हैरत नहि करती हे मुझको, जितनी करती हे वफ़ा के मसलों पर खामोशी तेरी, मुस्कुराता ये चेहरा खामोश दिखता है उसको, मेरे घर का आईना घोर से देखता है मुझको, -राजू गुजराती
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