जीवन और मौत
वो जीवन ही क्या जिसकी चैन से मौत न हो वो आदमी ही क्या सफल जिसकी चैन की नींद न हो। जीवन की सार्थकता यम के जोरदार स्वागत से है मौत के गर्म आलिंगन से है मृत्यु के सुखद उत्सव से है। वो जो अंतिम पल है न वो अंतिम पग है जीवन का उस एक पल पग के बाद कोई मोल नहीं अर्जित का । चैन की मौत मरें हम तभी तो वानप्रस्थ था जीवन भर के तनावों का उस समय उचित प्रबंधन था। वो जीवन ही क्या जो जबरदस्ती खत्म हो सारे काम अधूरे हों और यम हमें बाँध ले जाये। वो मरना ही क्या जब जीवन नितांत अकेला हो अस्पताल का सफेद बिस्तर हो और निर्जीव मशीनों का पीं-पीं हो । खुशी से मर सको निश्चिंत हो चिर निद्रा में सो सको बस यही है जीवन की सफलता यही अर्जित कर्म व सच्चा अर्जन है।
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