सूर्यमुखी
औरत गुलाब नहीं होती, वो होती है सूर्यमुखी के भांति। सूरज के निकलने पर उनके अंदर उत्साह आ जाता है। जैसे-जैसे सूरज निकलता है, वह खिल जाती हैं सूर्यमुखी के भांति। सूरज का आना उन्हें भर देता है उत्साह से। वह सूरज के आने पर झूम उठती हैं, सिकुड़ी हुई पंखुड़ियों को खोल लेती हैं। सूरज के आने पर हवाओं के संग झूमती हैं, खिलखिलाती हैं। सूरज महज़ रोशनी नहीं देता, भर देता है उन्हें अनोखी शक्तियों से। वह फूल बेखौफ झूमते हैं, हवाओं से प्रेम करते हैं, अपनी पंखुड़ियों को फैलाकर प्रेम करते हैं। धीरे-धीरे दिन बीतता है, और दिन बीतने पर सूरज पहाड़ी के पीछे छिपता चला जाता है। वह भी धीरे-धीरे अपनी पंखुड़ियों को समेटना शुरू कर देती हैं। कभी-कभी भंवरा भी उनमें कैद हो जाता है। सूरज के जाने पर वह भी मुरझा जाती हैं। शायद उन्हें भी अंधेरों से डर लगता है। उनकी खूबसूरती देखकर कहीं रात में कोई आवारा उन्हें छूकर तोड़ न ले। सूरज के जाने पर जैसे उस रात अंधेरे में एक सहमी-सी लड़की बेचैन थी, खुद को घर में कैद करने में। उसे भी डर होता है सूरज के जाने का, जैसे कोई कह रहा हो— “शाम होने से पहले घर आ जाना…”
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