सफर।
उम्रभर पस ऐ पर्दा रहा । असली चेहरा उसका था कहां मुझको तो खबर ही न थी उसने भी कभी कुछ न कहा । सबब कि मेरा अंधा यकीं पूछने की हिम्मत न कर सका । जो था मुझसे ज्यादा मेरा दूर बहुत दूर हो गया । मुझमें मेरा बस कुछ था ओर सब कुछ कहीं खो गया । ज़रा लिहाज़ करता महीनों साल का मैने आंखों से खून बहा । इस क़दर था मेरा दिल गुलाम तूने कहा जहां मैं चल दी वहां । मान ख़त्म,मेरी जान खत्म हाय क्या क्या मैने सहा । ओह इश्क की मंजिल नहीं है चलो ठीक है सफर अच्छा रहा । दीपज्योति ।।
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