"जीवन की राह"
हूं मैं चलता, निरंतर बहता, क्षण-क्षण में स्वयं को परखता । कौन हूँ मैं, कहाँ जा रहा, यही प्रश्न मुझे आगे बढ़ा रहा । बेचैन मन हौसले जगा रहा, सपनों की दुनिया में आगे बढ़ा रहा । अनजाना ये सफर है, जिसमें बढता जा रहा । मैं सहता रहा मैं बढ़ता रहा हर कठिनाई में आत्मा को संवरता रहा चंचल ये मन है मेरा जो है मुझे बहला रहा अनजाने इस सफर में हुं मैं चलता जा रहा.........................!
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