हुआ शहीद वो धन्य हुई मैं......
दो साल से हर दिवाली,उसकी माला बदलती हूं चंदन का हार चढ़ा के उसको,मन को शांत करती हूं कितना भी चाहूं शांत रहूं,पर आंसू टप टप गिरते है शहीद की मां हूं,इसी गर्व से, मैं संतोष करती हूं। लोग हैं कहते ममता कैसे तू रातों में सोती है.? बेटे के बिन ये तीज दिवाली,कैसे खुश हो सकती है.? कैसे उन्हें बताऊं दिल का आलम मेरे,क्या है हाल दो सालो से हर रातों में,खाली करवटें बदलती हूं। बेटे की बलिदानी को मैं व्यर्थ करूं क्यों रो धो कर क्यों करूं दिखावा अपने दुख का, घुमु क्यों पागल हो कर... दशा सुभद्रा सी है मेरी,अभिमन्यु को खो कर के इसीलिए मैं खुद ही खुद पे,बड़ा घमंड करती हूं। एक वीर पुरुष की वीर मां हूं मैं, इसीलिए इतराती हूं हुआ शहीद वो धन्य हुई मैं....... बेटे के गुण मैं गाती हूं...बेटे के गुण मैं गाती हूं।
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