सफर
सफर को यहां कौन समझता है बस सभी को मंज़िल नजर आती है इतना आसान नहीं है ये दोस्त इसमें जिंदगी गुजर जाती है जितने पर होते है, सितारे हारने पर हंसी उड़ जाती है खरीदते... खरीदते....किताबें गांव की जमी तक बिक जाती है गारंटी देते शिक्षा के सेठ इन्हें क्या....जेब भर जाती है जिताने में अपने बच्चों को बाप की बाजू थक जाती है बिकती है मा की गहनों तक और गांव में खिल्लियां तक उड़ जाती है सफर को यहां कौन समझता है बस सभी को मंज़िल नजर आती है।
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