" इंसान ये तेरी कैसी प्रगति?
विपदा आने पर त्राहि त्राहि मचाते हो.. खुद ही बन भक्षक, सब कुछ मिटाते हो..! ना पशु बचे ना पंछी, ना जंगल की शांति रही, हरियाली को नोच कर, क्यों वीरानियाँ सजाते हो.? हर ऋतु से शिकायत, हर मौसम से तकरार.. कभी सर्दी पे देते वार, कभी गर्मी से जलते हो..! मिट्टी की खुशबू लूटी, नदियों का बहाव छीन लिया, अब बंजर ज़मीं से भी, क्यों तकरार करते हो..! जल को गंदा कर , फिर सूखे की बात करता हो.. वायु में ज़हर घोल कर, साँसों से मात करता हो..। पेड़ जो तुझको जीवन दें, तुम कुल्हाड़ी बन गिरते हो, धरती माँ की गोद को भी, दर्द दे जाते हो..! रुक जा, सोच ले एक बार, ये राह तेरी कहाँ जाएगी? जो बीज तू आज बोएगा, कल वही फसल उग आएगी..! विनाश की ओर है क़दम , फिर भी तुम मुस्कुराते हो, जिस मिट्टी से जन्म लिया, उसी को लजाते हो..। अब भी वक्त है थम जा तू, फिर से कुछ उपकार कर.. प्रकृति को अपना समझ, उससे सच्चा प्यार कर..! जिस दिन टूटी उसकी ख़ामोशी , तेरा नाम मिटा देगी वो, मत भूलो एक बात , तुम दानव नहीं, मानव हो..! Jaya Ki Kalam ©️®️ #जयश्री_मिश्रा🖋 #jayashree17 #स्वरचित #मौलिक
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