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जब भी इस खिड़की के पास बैठते हैं एक परिचित हवा का झोंका मेरे मन को शीतल कर देते हैं, ऐसा लगता है जैसे घंटो इस खिड़की के पास बैठा रहू और नीले आकाश को अपने आंखों कि आगोश में लपेटा रहूं । एक कमरे मे बंद मै मेरे लिए तो खिड़की ही सहारा है, जहां शीतल हवा मुझे स्मृतियां याद दिलाती है और मै उस नीले आकाश को छू तो नहीं सकता मगर आँखे भर कर देख सकता हूँ, जितना चाहे उतना जैसे उसीसे मेरे दिल की सारी ख्वाहिश पूरी हो रही हो । लेकिन ये एक कैसा डर है “खिड़कि बंद हो गई तो” आख़िर ये बंद क्यों होगी ? क्या मैं यहां बैठने योग्य नहीं या फिर मैं इस खिड़की के पास बैठ कर ख़ुदको सिर्फ तसल्ली दे रहा हूँ ? मै समझ कर भी समझ नहीं सकता और मै ये डर निकाल नहीं सकता क्या ये खिड़की बंद हो जायेगी ?
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