विधाता छंद
हृदय से भाव फूटे तब, मधुर कविता सुनाएंगे। बहे जब धार गीतों की, तभी तो गुनगुनाएंगे।। रहे माँ की कृपा जिस पर, वही तो छंद रच पाता। रहे जब हाथ गणपति का, वही हो काव्य का ज्ञाता ।। करें चिंतन सदा ऐसा, रचें हम गीत अति प्यारा। कहे सुन लोग जब यूँ,गजब है गान मृदु न्यारा।। मनुज क्या देव भी थिरके, बहे लय ताल सुरधारा। करें अभ्यास नित ऐसे,बजे डंका जगत सारा।। नरेंद्र सिंह10.04.2025
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