पुस्तकालय की शांति
भरी दोपहर, बाहर कोलाहल, सड़कों पर जीवन का हलचल। पर इस द्वार के भीतर आते ही, थम जाती है समय की हलचल। यहाँ मौन एक भाषा है, यहाँ शांति एक परिभाषा है। पन्नों की सरसराहट भर, कानों में मिश्री घोलती है। किताबें आँखें मूंदे बैठीं, इतिहास, विज्ञान, कथाएँ कहतीं। ज्ञान की मंद-मंद यह धारा, बहती है चुपचाप अनवरत। हर पाठक एक साधक यहाँ, डूबा अपने ही चिंतन में। न कोई शोर, न कोई पुकार, बस विचारों का अथाह संसार। यह स्थान नहीं, यह एक ध्यान है, मन के मंदिर का शांत विधान है। पुस्तकालय की यह दिव्य शांति, आत्मा को देती नव जीवन दान है। - अनुष्का
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