तुम्हें चाहा, बस यूँ ही
तुम्हें चाहा, बस यूँ ही (एकतरफ़ा मोहब्बत की ख़ामोश दास्ताँ) तुम्हें चाहा, बस यूँ ही, बिना किसी उम्मीद के, बिना किसी शर्त के। तुम मुस्कराते रहे, और मैं देखता रहा, हर मुस्कान में अपना नाम ढूँढता रहा। तुम्हारे ख्वाब में कभी दस्तक न दी, बस चुपचाप आँखों में बसा लिया। तुम्हारे बिना भी जी लिया हर लम्हा, तुम्हारे होने का वहम बना लिया। तुमसे कभी कुछ माँगा नहीं, ना वक़्त, ना प्यार, ना एहसान। बस तेरी यादों को सीने से लगाया, और दिल को समझाया — यही है मेरा जहान। कभी तुमने महसूस भी किया क्या? कोई दूर से तुम्हें इस कदर चाहता रहा। भीड़ में भी बस तुम्हें देखता रहा, और अकेले में तुम्हारा नाम दोहराता रहा। तुम्हें चाहा, बस यूँ ही, जैसे सुबह चाहे सूरज की रौशनी, जैसे बारिश चाहे मिट्टी की खुशबू, जैसे बिना कहे कोई दुआ कबूल हो जाए। इश्क़ था मेरा, इबादत भी, तुम्हारी खामोशी में भी सुकून था कहीं। तुम्हें चाहा, बस यूँ ही... क्योंकि मोहब्बत हमेशा मंज़िल नहीं माँगती।
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