माहौल मेरे देश का।
इन दिनों अजब गजब है माहौल मेरे देश का, किसी के लिए दो वक्त का खाना, किसी के लिए मुद्दा है ऐश का। कुछ साल पहले भी लगे थे लाइन में कैश के लिए, आज फिर वही लाइन लगी है गैस के लिए। कुर्सी के मसीहा तड़फ रहे फिर एक बार सरेंडर के लिए, जनता बेचारी भटक रही सिलेंडर के लिया। अब लगता है उस महान वैज्ञानिक की तकनीक अपनाने पड़ेगी। बर्तन मे छेद करके किसी पास के नाले से गैस बनानी पड़ेगी। जागरूक जनता लाइन में , नौजवान रील बनाने में मस्त है, देश के कर्मठ ,ईमानदार नेता आने वाले चुनावों में व्यस्त है। मीडिया की भी दलाली भरी चाल है, अपना देश छोड़कर , वो बताएंगे पाकिस्तान का क्या हाल है। उन्हें फर्क नहीं पड़ता उनकी जेबें मालामाल है, देश में हिंदू, मुस्लिम सिक्ख सबका बुरा हाल है। विकास की ऐसी चली है रेल, कहीं कम न पड़ जाये मिट्टी का तेल। पॉवर का ये कैसा खेल, हर इंसान रहा है इसे झेल। आज नहीं तो कल तुम्हे जरूर ये बात याद आएगी, संकट भरे इस दौर में शिक्षा और तकनीकी ही हमें बचाएगी।
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