" शून्यता"
हृदय के आंगन में खिले हुए थे कुछ फूल प्रेम की माटी पर, स्नेह की धूप में पले - बढ़े लहराते रहे अंधड़ - तूफानों के बीच मगर उखड़ कर गिरे नहीं कभी मगर यकायक वो मुरझा गए लगभग, सारे के सारे.. जब टटोला तो पाया कि दीमक लग गई थी जड़ों में एक धीमे जहर की तरह फैलकर जो वीरान कर गई एक उपवन को और उत्पति और विनाश की इस प्रक्रिया में... शेष रह गई एक "शून्यता" न अहंकार - न आशा.. एक सहमी और स्तब्ध शून्यता
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