कब तलक तेरे इश्क़ को रोयें?
एक उम्र हुई खुद को भुलाए, बस तेरी राहों में खाक छानी है, मगर अब थक चुके हैं पाँव मेरे, और घर की दीवारें पुरानी हैं। माना कि तेरी याद का चिराग, मेरी रूह में रौशनी भरता है, पर एक घर है जो मेरी फिक्र में, हर रात सिसकियाँ भरता है। कब तलक तेरे इश्क़ को रोयें, मेरे घर के भी हज़ार मसले हैं, कहीं चूल्हे की सर्द आहें हैं, कहीं छत से गिरते ये मलबे हैं। तेरे खत संभालूँ या वो बिल, जो मेज़ पर चीखते रहते हैं? तेरी यादों में गुम रहूँ या वो फर्ज़, जो लहू बनकर बहते रहते हैं? बाप के कंधों का बोझ है, जो अब झुकने को आए हैं, ज़िम्मेदारियों के ये साये हैं, जो धूप बनकर छाए हैं। इश्क़ अधूरा रह गया तो क्या? खैर कहानियों में तो ऐसा ही होता है, मगर अगर घर बिखर गया , तो इंसान ता-उम्र रोता है। तू अज़ीज़ है जरुर पर अब मुझे अपनी दहलीज़ को संभालना होगा, तेरी यादों के इस रेशमी जाल से, खुद को बाहर निकालना होगा। अब रुखसत दे कि शाम ढल रही है, और काम अभी बहुत बाकी है, तेरी याद से पेट नहीं भरता, अब हकीकत ही मेरी साकी है।
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