कुछ अलग सा है!!
ये नया तो नहीं पर कुछ अलग सा है शर्तों वाला नहीं बराबरी सा है, ये अहसास ऐसा नहीं पहली दफा है जिससे है बस उसका प्यार वफ़ा है, करती है वो मुझको बावली होके प्यार ऐसा कह चुकी वो रो रो के कई बार, पर मैं न कुछ कह सका हूं अब तक उससे यक़ीनन हूं कन्फ्यूज्ड अपने अंतर्मन से। है उलझनों में अभी मेरा ये दिल बांवरा सा भटक रहा ये 'ज़ाहिल', समझ ही नहीं आ रहा ऐसा क्यों हो रहा है उठती हैं तरंगें जब बड़े ही वेग से कुछ थम सा जाता है कहीं उद्वेग से। जिस दिन मैं इनको पहचान लूंगा व्यथित अंतर्मन की आवाज़ को जान लूंगा, उस दिन न होगी कोई कमोवेश उलझन बस कस कर गले लगा लूंगा मसलन, उनके माथे की सिलवटों को मैं चूम लूंगा उठा के बाहों में उनको मैं झूम लूंगा , ये अहसास ऐसा नहीं है पहली दफा है पर सच में मेरा वो प्यार उनके लिए है वफ़ा ।।
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