पितृ दिवस पर दो शब्द
पिता ने मुझको पाला, बचपन में मुझे सँभाला। कभी बन घोड़ा हाथी, बनकर कभी ये साथी।। कंधे पर गली घुमाया, अँगुली पकड़ टहलाया। माँ से कुटे जब जाते, पिताजी ढाल बन आते।। पोंछ अश्रु पीठ सहलाते, वे थे जो मन बहलाते। पेट काट मुझे पढ़ाया, काबिल मनुष्य बनाया।। कीमती वस्त्र तन न चढ़ाये, सपने रहे उर सजाये। पिता आधे पेट सो जाते, तभी पुत्र सफलता पाते।। उनकी कमी है खलती, मन में है वेदना पलती। पितृ प्यार कहाँ मैं पाऊँ, कैसे उनका कर्ज चुकाऊँ।। नरेंद्र सिंह, अतरी, गया
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