प्रार्थना
ये कैसा आबोहवा ये कैसा उपवन है हर साख कंटीला बना छिलता तन मन है जहाँ सुमन के सुगंध से व्योम सुगंधित होता वहां आपसी द्वेष ने मचाया कुरुक्षेत्र है। बिखर रहे हैं मोती सभी माला कैसे पिरोई जाए मन अवसाद में पड़ा सोचता अपनों को नैतिक कैसे बनाया जाए। आज तमस हावी है सबके व्यवहारों पर कहीं अहम का नशा कहीं तपिश बोली कि हर एक युद्धाभ्यास में लगा अपना आपा खोए न जाने क्या पाना है न जाने कहाँ पहुंचना । हे आराध्य ! विनती आपसे । कुनबा बिखरने से रोक लो सबके मन में सद्भाव सद्बुद्धि आवे इस घोर तिमिर में नयी रोशनी दो। सबके मंगल में ही अपना कल्याण निहित हो विशुद्ध प्रेम के आधार पर ही आपसी संबंध हो निर्मल मन मीठी बोली और सहनशक्ति आपार जीवन मूल्यों का विकास हो सब करें सही प्रयास।
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
