// अगर मैं उड़ सकती //
परदेस में मेरी शादी तो कर दी माँ, पर तेरे साथ अपना घर बहुत याद आता है, अगर मैं पंछी होती तो, पंख लगा तेरे पास पंछी की तरह मैं उड़ सकती, मेरा मन उन्मुक्त गगन के पंखों को फैला उड़ता, मस्त पवन के झोंकों से मन और तेजी से मिलने को तड़पता, पंखों को फैला अगर मैं उड़ सकती तो पूरे आसमान में भी एक आशियाना घर होता, देखती आसमान के पंछी को जैसे निशब्द हो, दिल बहुत कुछ खामोशी में कह जाती, आंगन बेठी, देखती उन उड़ते परिंदे को और सोचती, काश मैं उड़ सकती, तेरे पास, दिल की बातें कहने को आ जाती, तेरी याद में मन बस यही सोचे, हम पंछी होते उड़ते अपने मगन में, और जब चाहे मिलने आती और शाम होते, अपने घोसले में जैसे पंछी लौटे, घर में मै भी लौट आती, काश अगर मैं उड़ सकती, तुमसे रोज-रोज में मिल, खुब लाड करा पाती माँ । ।।
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