मां
कोई सूरत,कोई मूरत,कोई लम्हा नहीं देखा उसे खोकर दुबारा फिर कोई चेहरा नहीं देखा सफेदी भाल पर फैली,पूनम की शाम लगती थी दमकती रूह तक अक्सर पाकीजा चांद लगती थी मगर लगता है फ़िर वैसा कोई असबाब नहीं देखा कोई सूरत,कोई मूरत,कोई लम्हा नहीं देखा कई लम्हे,कई शामें,गुजारी हमने रो रोकर मगर तन्हा था,तन्हा है,उसे दिल खोखोकर बहुत चाहा उसे रोकें, कहीं जज़्बा नहीं देखा कोई सूरत,कोई मूरत,कोई लम्हा नहीं देखा अभी भी याद है उसका,खफा हो,लाल हो जाना मुझे गुस्से से यूं तकना,खुदी बेहाल हो जाना तलाशा अपनी ग़ज़लों में,कोई मिसरा नहीं देखा कोई सूरत,कोई मूरत,कोई लम्हा नहीं देखा राजीव
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