जिंदगी
सड़क पे एक पत्ता गिरा था — बस यूँ ही, जैसे कोई बात दिल से फिसली हो... ज़िंदगी भी वहीं कहीं पास बैठी थी, धूप के किनारे — थकी हुई सी। दरख़्त चुप था, मगर उसकी शाखें कुछ कहती थीं — जैसे कोई बाप अपने बेटे को चुपचाप विदा कर रहा हो। पत्ते ने ज़मीन छूकर आवाज़ नहीं की, सिर्फ़ गिरा... जैसे कई रिश्ते गिरते हैं — बिना शोर किए। सड़क ने सब देखा, पर कुछ कहा नहीं — सड़कें सिर्फ़ चलने देती हैं, समझती नहीं। दरख़्त अब भी खड़ा है, पत्ते अब भी गिरते हैं... और ज़िंदगी...? वो अब भी धूप के एक टुकड़े में सिमटी बैठी है, तुम्हारे लौट आने के इंतज़ार राजीव......
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