हरिगीतिका छंद
वृक्ष बचाओ वट आम्र पीपल नीम जो है, अब सभी संभालना। सोओ नहीं अब जाग जाओ, पेड़ को है पालना।। अति ताप अब बढ़ने लगा है, सृष्टि अब कैसे सहे। हो हरित अब सारी धरा यूँ, ताकि ये जीवन रहे।। धरती लगी अब खूब तपने, सन्निकट विपदा खड़ी। ये आफतें चेता रही है, आ रही संकट घड़ी।। हे नर बनो मत काल अपना, वृक्ष अब मत काटना। चहुँ ओर हरियाली सघन हो, धरा को अब पाटना।। नरेन्द्र सिंह
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