"कलम की आज़ादी"
सदियों से लफ्ज़ों में जज़्बात बोता आया, सच्चाई को स्वर देकर, मैं दुनिया से टकराया। पर हर बार कलम पर पहरा लगा, सवाल पूछने पर नाम मेरा 'ग़द्दार' रखा। काग़ज़ को हथियार बना, न तलवार उठाई, बस सच लिखा — वो भी किसी को रास न आई। कभी धर्म का डर, कभी सत्ता का साया, हर ओर चुप्पी का ही पहरा पाया। लेकिन अब नहीं, अब चुप न रहूँगा, हर बेड़ी तोड़, सच का दीपक फिर से जलाऊँगा। मेरी कलम बिकेगी नहीं दरबारों में, न झुकेगी किसी हुक्म के इशारों में। मैं आज़ाद हूँ — अपने लफ्ज़ों में, अपनी सोच में, हर उस ख्वाब में जो ज़ुबान चाहता है। कलम अब डरती नहीं है — वो आग है, जो अंधेरों को चीर देगी, वो पानी है, जो पत्थरों को भी चुप करा देगी। मैं वो कवि हूँ, जो अब केवल कविता नहीं लिखता — मैं लिखता हूँ इंकलाब, हर पंक्ति में, हर स्याही की धार में।
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