यह खेल नही आसान ( कविता )
यह खेल नही आसान ( कविता ) दुनिया एक खेल है हम सब है इस मे खिलाडी समझते है सब अपने आप को होशियार पर सब है अनाड़ी रहते हुए भी दुनिया मे निभा नही पाते अपना कर्म ( मा बाप की सेवा ) बस निभाते तो सिर्फ धर्म नौ महीने हर दर्द सहकर रकत से सीचकर करती है वो नई जिन्दगी का निर्माण बच्चे करते नही उसका माण और उसे क्यो देना पडता है उसे अपनी ही सच्चाई अच्छाई का प्रमाण जहा मा करती है अपने बच्चे पर उसके जन्म से लेकर अपने मरण तक सब कुछ निछावर वहा बाप भी खूब मेहनत करके देता है अपने बच्चो के सपनो को पंख और पावर बच्चे बडे होकर जब यह कहते है अपने मा बाप से आपने हमारे लिए किया क्या है तोड देते है उनकी उम्मीदो का टावर संघर्षो की दुनिया मे मा बाप करते है संघर्ष अपने बच्चो के लिए बच्चे करते है संघर्ष अपनी खुशियो के लिए खुद गीले मे सोकर सूखे का एहसास कराती है वो ( मा) खुद भूखी रहकर भी हमारी भूख पूरी कर भूख कितनी खास है समझाती है वो दिन रात एक कर बाप कमाता है पैसे खर्च करते है बच्चे उन पैसो को ऐसे ( बिना किसी जरूरत के ) पता नही क्यो बच्चे बड़े होकर भूल जाते है सब ऐसे जैसे विरासत मे मिला हो वैसे ( बिना कुछ करे ) समझते नही बच्चे की जैसा बोएगे वैसा ही तो पाएंगे कर्म का हिसाब तो यही ( घरती) चुकाएगे मा बाप तो खुद काॅटो की राह चलते हुए भी बच्चो के मन मे होसलो के दीप जलाते है बच्चे अपने लिए तो सब कुछ करते है परन्तु समझ नही आता क
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