बैरी दिल्ली
ये दिल्ली ! तुमसे मेरी ठनी क्यों है मैं जब भी आया तेरे द्वार रातें जगी क्यों है तुम बुलाती भी हो फिर मुझे भगाती भी हो ये प्रेम है या बैर तुम न बताती न छुपाती हो । आखिर कब तक चलेगी ये तकरार कब पनपेगा हम दोनों में दृढ़ विश्वास आखिर कब मेरी सजा बरक़रार रहेगी कब तेरे रुसवाई से मासूम की रिहाई होगी । चलो आज की रात फिर जग कर काट लेता हूं फिर कभी और आऊंगा तो तुमसे बात करता हूं मेरे लिए क्या इतना ही कम है कि टीस है अब भी पुरानी ही पहचान का सही कुछ तो एहसास है अब भी ।
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