चार जिगरी यार।
खाली बैठे चार जिगरी यार, मन में आया घूमने का विचार, एक दोस्त की पुरानी सी कार, उसमें हो गए सवार। थोड़ी दूर की तय की दूरी, कार ने दिखाई ना मंजूरी। गर्मी में जैसे घुटने लगा दम, एक दम से कार गई थी थम। एक ने शर्ट की बाजू को किया फोल्ड, दूसरे ने बोनट को किया होल्ड। तीसरे ने औजारों से किया वार, काफ़ी प्रयास के बाद भी हाथ लगी हार। चौथे ने कुछ किए यत्न, पता लगा कि टंकी का पेट्रोल था खत्म। सबने गाड़ी के मालिक की ओर ताड़ा, मन ही मन उसको खूब लताड़ा। जिम वाले दोस्त ने लगाया पूरा जोर, गाड़ी को धकेला पेट्रोल पंप की ओर। धकेल धकेल कर सबकी हालत हो गई ढीली, पसीने में सबकी शर्ट हो गई गीली। पेट्रोल डलवाकर गाड़ी में बैठते ही राहत की सांस आई, पर शायद गाड़ी को ये बात रास न आई। सुनसान सड़क एक दम अनजानी, कार ने आगे बढ़ने में की आना कानी। ए सी में बैठने की उम्मीद खत्म हो गई सारी, आ गई फिर से धक्का मारने की बारी। तीन दोस्तो ने खड़े कर दिए हाथ, कार और कार के मालिक का छोड़ दिया साथ। घूमने की सिर चढ़ी थी ऐसी खुमारी, कार छोड़कर बस की करनी पड़ी सवारी।
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
