सरकारी नौकरी और सरकार
क्या बताये हमें किन किन सहारों ने सताया है, जब कोई उम्मीद मिली तो ऐसे ही लटकाया है। बैंक इएमआई जेब को कुतर कुतर खा रही है, ऊपर से महंगाई भी अपना असर दिखा रही है। सरकारें चुनावी बिसात पर खुद के दांव खेल रही हैं, डीए रूपी आहटी पाँव से हमें धीरे धीरे धकेल रही है। कभी एनपीएस तो कभी यूपीएस का नारा है, ओपीएस की आस पर बस अदालती सहारा है। सरकारी रिमोट से घड़ी घड़ी हम दब रहे हैं, अपने लिए सोचें अगर तो जी ही कब रहे हैं? जवानी लोन पर देकर बुढ़ापा बचा रहे हैं, कदम कदम पर खुद को खूब नचा रहे हैं। पढ़ाई लिखाई भी आजमा कर थक चुके हैं, पाँव हमारे अब इसी राह में ही दहक चुके हैं। आर्थिक हिसाब किताब हमसे बिगड़ता है, हमें कुछ देने से सरकारी घाटा बढ़ता है। सरकारी नौकरी में मूल जरूरतें समय पर पूरी होना ही बहुत है, लोगबाग कहते हैं यार गजब हो, तुम सरकारी हो इतना ही बहुत है।
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