अभागी
संस्कार खो गए कहीं अंधेरे कमरे में बलात्कारी संरक्छित है आलीशान बगले में मर्यादाएं हाथ धो रही , निर्भया के आंसू से... अब कब तक दर दर भटकेंगे? कब तक चोखट पर सर पटकेगे? और कितनी बेटियां खोएंगे? और कितने आंसू रोएंगे? क्यू भीख मांगते रक्षा की हम... क्यू हमदर्दी पाएं? जिनको जना ह्मी ने...उनके द्वारा ही मारे जाएं? आन पड़ेगी मानव जाति को विपदा भारी, जब हाथ खड़े करदेगी तुमको जनने से नारी।
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