"सरकारी सपने"
ये तय करना मुश्किल है, कहाँ हार गए हैं हम। सरकारी नौकरी के सपने थे, या इश्क़ में टूटे हैं हम? कभी लाइनों में खड़े थे, हाथ में फ़ॉर्म, दिल में उम्मीद, तो कभी किसी की याद में, भीगे काग़ज़, टूटी तक़दीर। माँ कहती थी - बेटा अफ़सर बन, पिता बोले - घर की शान बन, दिल बोला - बस उसका हो जा, जिसके नाम से साँस चले सधा। कोचिंग की फीस भी भारी थी, और इश्क़ की क़ीमत भी कम ना थी, एक तरफ़ सिलेबस का बोझ था, दूजी ओर मोहब्बत की नमी थी। कभी ठुकराया सिस्टम ने, कभी उसने जो "हम" नहीं बना, अब बैठा हूँ इस मोड़ पर, जहाँ ना सपना, ना कोई ग़म बचा। ये देश का युवा रो रहा है, काग़ज़ों के ढेर में खो गया है, न नौकरी मिली, न साथी मिला, बस एक खोखला जीवन बो गया है।
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