जो हम लिखते
जो हम होते लेखक तो कुछ ऐसे लिखते वो धरती जो बैठी किनारे पर जाकर उसे, प्रेमिका बादलों की बताते वो प्रेमी जो प्रेम में डूबा हुआ है उसे प्रेम की चार पंक्ति सुनाते वो लिखते बचपन के किस्से कहानी कभी लिखते बीते पलों की निशानी कभी लिखते सावन जरा मनचला है कभी लिखते करने से होता भला है कभी बिजलियों को ज़मीन पर बुलाते कभी लहरों को भी ठहरना सिखाते कभी चार शब्द सफ़लता पर लिखते तो असफ़लता के भी दो बोल सुनाते कभी सूखे फूलों को फिर से खिलाते कभी साँझ को सूरज से भी मिलाते थोड़े सयाने थोड़े पागल से दिखते...... जो हम होते लेखक तो कुछ ऐसे लिखते....
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