धर्म और आस्था
उमा श्रावण में उमड़े जन समुह को देख चकित थी आज के युग में इतनी भक्ति और धर्म का बोला बाला बोली अपने भोले पति से, देखो सत युग लौट आया है जन जन के मन में धर्म और आस्था फिर समाया है। भोले मुस्काये उमा को समझाए बोले भीड़ को धर्म से न जोड़ो प्रिय ये तो छलावा है, अस्था नहीं दिखावा है पर उमा को भोले की बात समझ न आयी । फिर शिव उमा को उस भीड़ में ले गए उमा दुखियारी बनी भोले लाचार और बीमार पति के लिए उमा ने सबसे पुण्य की भीख मांगी कोई नहीं मिला भीड़ में जो पुण्य का दान कर सके । पैसों, सलाहों और दुत्कार से उमा का आंचल भर गया था पुण्य तो छोड़ो, किसी ने उमा का दर्द तक नहीं समझा था सबको बहुत जल्दी थी, मंदिरों की लाइन बहुत लम्बी थी उमा निराश थी परेशान थी, अपनी समझ पर हैरान थी। तभी भीड़ से एक व्यक्ति आया बोला उमा से अगर मैंने इस जीवन में कुछ पुण्य किया है तो फिर अर्पण करता हूं वो सभी पुण्य मैं आपको प्रार्थना है कि इस पुण्य से उद्धार हो आपके पति का। उमा द्रवित हो उठीं कोई तो मिला जो उनके लिए जीवन का अर्जित संपूर्ण पुण्य अर्पित करने को उतारू था।
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