चाहत
मान क्यों फिर कर रही हो, आज मेरी माननी तुम । हूँ अधूरा बिना तुम्हारे प्रेम के, हो कामिनी तुम ।। चाहते वारी तुम्ही पर, मन समर्पित कर दिया है । भीगती इस रैन में मधु रूप की हो दामिनी तुम ।। हुआ अब तक नहीं अपना, जमाने में सगा कोई । भरोसा एक तुम पर है, नही करना दगा कोई ।। बड़ी उम्मीद से तुमसे, करी है प्रेम की चाहत ।। नहीं तुम दिललगि करना, कहीं दिल को लगा कोई ।।
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