नारी का आत्मसम्मान
तुम मत आकों मेरे पहनावे से संस्कार मेरे.. मैने घूंघट के अन्दर से लोंगों को घर तोड़ते देखा हैं.... मासूम सा दिल हैं थोड़े हैं सपने उसमें यूं मत तोड़ों अरमान मेरे.. मैनें अन्दर-ही-अन्दर खुद को बिखरते देखा हैं.. इक फूल सा नाजुक हैं मन मेरा.. स्नेह प्यार का है ये भूखा.. जंजीरों में जकड़ने से रिश्ते नहीं पनपते,, मैने बन्द कमरों में फूलों को मुरझातें देखा हैं... मैं हर रोज बनूंगी पहले से बेहतर बस थोड़ा सा विश्वास करों... बहूं नहीं बेटी मान के देखों मुझे, इक बेटी बनकर मैं अपनी जान लुटा दूंगीं, मैनें बेटो को तो माँ-बाबा से लड़ते-जी चुराते देखा़ हैं... चाहती हूं मैं भी चलूं जग में जमाने से कदम मिलाकर, थोड़ा सा चाहूँ संजना-संवरना सुन्दर दिखना, इक नारी के से स्वाभाविक शौक-सहज भावना.. नहीं चाहिए धन-जागीरें खुश हो जाती हूँ छोटी तारीफों से.. मैनें मुऱझायी ड़ाली पर फूल खिलते नहीं देखा हैं.. कठिन परिस्थियों में भी मैं अढ़िग शिला सी हूँ , आपके साथ सदा ,मुझे कमजोर ना समझों, मैनें नदियों को बहते देखा़ हैं... माना ढंग काम करने के अलग मेरें पर हैं मेरे भाव सही.. क्यूं हर वक्त मुझें अपने किये की सफाई यूं देनी पड़ती हैं.. यूं उपेक्षाओं की तुला पर तोलना बन्द करों... हर वक्त मैनें अपना मूल्यांकन होते देखा हैं... आभास मुझे अपनी मर्यादा का तुम भी मत भूलों अधिकार मेरे कभी चोट ना करना इस पर, आत्मसम्मान आज भी मुझे सबसे प्यारा हैं....
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