चाँद और मैं....
छत पे खड़ा हूँ, रात ठहरी हुई है, चाँद नहीं, बस याद गहरी हुई है। तारों से पूछूँ, वो कब आएगा, हर एक झिलमिल में आह भरी हुई है। हवा भी खामोश, आसमां सुन्न सा, साँसों में कोई कमी सी हुई है। वो चाँद जो हर रात साथ था मेरे, आज उसी से दूरियाँ बढ़ी हुई हैं। माना कि बादल की चादर तनी है, पर दिल में अब भी वही रोशनी है। हर एक लम्हा उसे पुकारता है, ये रात भी जैसे ठहरी हुई है।
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