चिड़िया मेरी
कुछ बातें तू विरासत में न लेती, हक जताती, और तकलीफ़ बोल देती। अपने कंधों को थोड़ा ढीला करती, और रोते-रोते कभी मेरी हथेली गीला करती। चुपचाप रहना छोड़ देती, अपनी परेशानी मेरी ओर मोड़ देती। बस ग़म नहीं, खुशियों का स्वाद भी चखती, और बोलते-बोलते तू कभी न थकती। चिड़िया मेरी, हमेशा फुदकती रहे — काश मैं समझ पाऊं तुझे, तेरे बिना कुछ कहे। एक खुला सा दिल और बोलती सी आँखें रखना, तेरे हर दुःख में मुझे शामिल रखना। मैं तेरे और तू मेरे साथ रहना, बिन बोले ही मुझसे हर बात कहना। तू जब पुकारे, मुझे अपने पास पाएगी — तुझे छोड़कर, तेरी माँ कहीं नहीं जाएगी।
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