किसान
सब कुछ तो ठीक था अभी नयी आशा नयी उम्मीदें लगी थी किसी को कर्ज चुकाना था तो कहीं बहनों की शादी थी । बस खुशहाली घर आने ही वाली थी सारी योजना सब सपने बुने जा चुके थे तभी एक दिन आकाश से अमृत वर्षा होती है पर ये पानी अमृत नहीं विषपान कराती है । खेतों में हँसते खेलते लहलहाते फसल सो गए और खो गयी किसानों की उम्मीदें और सपने शतक बनने ही वाला था आखिरी गेंद पर आउट हुवे हाय रे किस्मत! किसान फिर से तंग- तंग हुवे। क्या करें बेचारे! हर ओर से हैं ये मारे कैसे रुके मंहगाई जब अन्नदाता पर ही संकट आयी कौन समझेगा दर्द इनका कौन देखे अंदर की पीड़ा बस खेती एक जुआ है कह कर अपनी रुदन छुपाई। मां अन्नपूर्णा रूठी हैं या रूठा है इनका किस्मत सिसक रहीं हैं धरती माता और उनके सेवक का मन तंग आ चुके हैं अब इस जुवे के हमेशा के हार से कर रहे पलायन बेचते पुरखों के संचय और काम को।
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