सौरठा
करो लक्ष्य संधान, श्रेष्ठ कर्म को साधकर। मिलता तब ही मान, इसे गांठ बाँधो सभी।। उत्तम कर सत्कर्म, जीवन सार्थक तब बने। मानव सेवा धर्म, इसका पालन हो सतत।। बने वही नर श्रेष्ठ, जिए लक्ष्य संधान कर। वह कहलाता ज्येष्ठ, इज्जत पाता लोक में ।। मनुज वही इंसान,दीनों पर जो ध्यान दे। जीवन सार्थक मान, ईश्वर भेजा है जगत।। मानव प्रभु का अंश, सबमें मालिक व्याप्त है। हम सब उनके वंश, किसी का न अपमान कर।। 06.05.2025
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