वो
कुछ बेनज़ीर नायाब कुछ अज़ाब सा लगता है वो तारों की भीड़ में आफताब सा लगता है कुछ पाने सी ख्वाहिश कुछ खोने सा डर, वो ना मिलने वाला इक ख्वाब सा लगता है हजारों ग़मों में इक राहत का ज़रिया, वो काटों के बीच इक गुलाब सा लगता है जिससे कह सकती हूं मैं सारी आपबीती वो अपना मुझे दिलराद सा लगता है
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