रामजी की निकली सवारी
सज धज कर निकलीं, श्री राम की सवारी; जिधर गुजरती,दर्शन को उमड़ती भीड़ भारी। चारों वर की सुंदरता थी, अतीव न्यारी-प्यारी; राह में रामलला की आरती उतारते नर नारी। अयोध्या से जनकपुर में आई राम की सवारी; भाव विभोर हुई, जनकपुर की जनता सारी। रामरुप देखकर,मुग्ध थे मिथिला के नर-नारी; मिथिला की नारियां राम को देती मंगल गारी। धन्य हुई मिथिला की धरा व आंगन विदेह के; जिस भू पर प्रभु पहुंचे,साक्षात अपनी देह ले। धन्य हुए मिथिला वासी,धन्य हुई जनकदुलारी; पुनः सपत्नीक राम चारों भाई,ले लौटीं सवारी।। नरेंद्र सिंह 18.01.2024
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