नाकाम मुहब्बत
तलब होनी चाहिए मुक्कमल मुकाम के लिए जैसे बेरोज़गार परेशान हो काम के लिए हर हुकुम मानना पड़ता है उस शख्स का ऐसे जैसे असूल की पास़दारी हो गुलाम के लिए दो दिन की चाहतों का अब माहौल हो गया अब मोहब्बत हो गयी हो जैसे सरेआम के लिए बस इतना समझ लीजिए मुमकिन नहीं है अब आंखें काग़ज़ और धड़कन अल्फाज़ रहती थी तब पैगाम के लिए आशिक से अलिहद़गी सबके बस की नही है इक शेर ढूढ़ना पड़ता है हर शाम के लिए दुनिया वाले कहते हैं खोया क्या है तुमने तो बताओ बचा ही क्या है मुहब्बत में नाकाम के लिए
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